स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में आयोजित अमेरिका-ईरान शांति वार्ता उस समय सुर्खियों में आ गई, जब ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई चेतावनी पर नाराजगी जताते हुए कुछ समय के लिए बैठक स्थल छोड़ दिया। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से संक्षिप्त बातचीत की और फिर अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक कक्ष से बाहर निकल गए। इस दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी मौके पर मौजूद थे और उन्होंने पूरे घटनाक्रम को करीब से देखा।
अमेरिका-ईरान शांति वार्ता से पहले क्यों बढ़ा विवाद?
ईरानी मीडिया के मुताबिक, औपचारिक बातचीत शुरू होने से पहले ही तनाव की स्थिति बन गई थी। ईरान ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ प्रस्तावित संयुक्त फोटो सत्र में शामिल होने से इनकार कर दिया। तेहरान ने इसे अमेरिका का “मीडिया प्रदर्शन” बताया।
तनाव उस समय और बढ़ गया, जब डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि उसने अपने सहयोगी समूहों की गतिविधियों पर रोक नहीं लगाई तो अमेरिका कड़ी कार्रवाई करेगा।
ईरान ने ट्रंप की टिप्पणी पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई और कुछ समय के लिए बातचीत से दूरी बना ली।
बंद कमरे में जारी रही बातचीत
हालांकि शुरुआती तनाव के बावजूद वार्ता पूरी तरह विफल नहीं हुई। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच करीब 80 मिनट तक चर्चा हुई।
बैठक में आर्थिक प्रतिबंधों में राहत, ईरान की जमी हुई संपत्तियों की रिहाई और हाल ही में हुए इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन के क्रियान्वयन जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई।
सूत्रों के मुताबिक, कतर की भागीदारी के साथ ईरानी संपत्तियों को जारी करने की प्रक्रिया पर भी प्रारंभिक सहमति बनी है। इसके अलावा, ईरानी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में छूट से जुड़ा मसौदा भी तैयार किया गया है।
आगे की राह आसान नहीं
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम दिखाता है कि दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी अभी भी बरकरार है। हालांकि वार्ता जारी रहना सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, लेकिन आने वाले दौर यह तय करेंगे कि दोनों देश किसी ठोस समझौते तक पहुंच पाते हैं या नहीं।
फिलहाल, स्विट्जरलैंड में हुई यह अमेरिका-ईरान शांति वार्ता एक बार फिर साबित करती है कि मध्य पूर्व में स्थिरता की राह अभी भी बेहद संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

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