भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायपालिका की भूमिका, संवैधानिक मूल्यों, लंबित मामलों और न्यायिक सक्रियता जैसे अहम मुद्दों पर अपनी बात रखी है। डीडी न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है और उसके फैसले किसी पक्ष या विपक्ष को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के आधार पर किए जाते हैं। उन्होंने संविधान को देश की सबसे बड़ी शक्ति बताते हुए उसके मूल ढांचे की रक्षा को न्यायपालिका की अहम जिम्मेदारी बताया।
न्यायपालिका किसी पक्ष के लिए फैसला नहीं करती
CJI सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका किसी पक्ष या विपक्ष के लिए फैसला नहीं करती। उसका दायित्व संवैधानिक मूल्यों और संविधान की रक्षा के प्रति समर्पित रहना है। उन्होंने समानता, गरिमा, कानून का शासन, लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्र न्यायपालिका को संविधान के बुनियादी वादों का हिस्सा बताया।
संविधान को बताया देश की सबसे बड़ी शक्ति
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि देश में सबसे बड़ी शक्ति संविधान है और इसे सर्वोच्च माना गया है। उन्होंने कहा कि संविधान के बुनियादी ढांचे की रक्षा करने और उसे मजबूत बनाए रखने में भारतीय न्यायपालिका की अहम भूमिका है। उनके मुताबिक न्यायपालिका को अपनी इस जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्ध रहना होगा।
लंबित मामलों को कम करने पर भी फोकस
CJI सूर्यकांत ने अपने कार्यकाल की प्राथमिकताओं में लंबित मामलों को कम करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि मुख्य न्यायाधीश का पद संभालते समय उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनकी प्राथमिकता केवल प्रशासनिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहेगी। इसके साथ ही लंबित मामलों के निपटारे के लिए विशेष कार्रवाई का संकल्प लिया गया।
केस मैनेजमेंट के लिए बनाई गई योजना
उन्होंने बताया कि केस मैनेजमेंट के लिए एक व्यवस्थित योजना बनाई गई, जिसे अदालतों में डॉकेट मैनेजमेंट कहा जाता है। संवैधानिक बेंचों के गठन और कुछ मामलों को एक साथ जोड़ने से सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला अदालतों में न्यायिक प्रक्रिया को व्यवस्थित करने में मदद मिली है।
महत्वपूर्ण मामलों को पहले निपटाने की रणनीति
CJI सूर्यकांत के अनुसार कुछ मामले बेहद संवेदनशील या महत्वपूर्ण होते हैं और उनका असर देश तथा विभिन्न अदालतों पर व्यापक पड़ता है। ऐसे मामलों के लंबित रहने से हजारों अन्य मामले भी प्रभावित होते हैं। इसलिए पहले ऐसे मामलों की पहचान कर उनके निपटारे पर ध्यान दिया गया। इसी उद्देश्य से संवैधानिक बेंचों का गठन किया गया और कई मामलों को एक साथ जोड़ा गया।
न्यायिक सक्रियता को लेकर CJI सूर्यकांत की राय
न्यायिक सक्रियता पर बात करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि देश के हालात बदल सकते हैं, लेकिन संविधान का मूल ढांचा वैसा ही रहेगा। उन्होंने कहा कि इसे बदला नहीं जा सकता और इसे पूरे सम्मान के साथ मजबूत किया जाना चाहिए।
कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा जरूरी
CJI सूर्यकांत ने कहा कि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा है। ऐसे लोग अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के लिए आसानी से अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा पाते। ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप को उन्होंने संवैधानिक जिम्मेदारी से जोड़ा।
PIL और स्वत: संज्ञान को बताया जरूरी माध्यम
मुख्य न्यायाधीश ने जनहित याचिका यानी PIL और सुओ मोटो यानी स्वत: संज्ञान की भूमिका पर भी बात की। उन्होंने कहा कि ये माध्यम उन लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी हैं जो खुद आसानी से अदालत तक नहीं पहुंच सकते। उनके अनुसार अदालत खुद कार्रवाई करे या कोई व्यक्ति जनता के प्रतिनिधि के तौर पर जनहित याचिका के जरिए मामला उठाए, अधिकारों की रक्षा करना न्यायपालिका की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
न्यायिक सक्रियता को गलत नजरिए से न देखने की अपील
CJI सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक सक्रियता का मूल सार यह है कि पारंपरिक रूप से दो पक्षों के बीच चलने वाले मामले के बजाय कोई व्यक्ति जनता या समाज के बड़े हिस्से के अधिकारों से वंचित किए जाने का मुद्दा अदालत के सामने लाता है। उन्होंने कहा कि इसके जरिए उन लोगों को अधिकार दिलाने का प्रयास होता है जो सीधे अदालत के सामने मौजूद नहीं होते, बल्कि किसी प्रतिनिधि के माध्यम से अपनी बात रखते हैं।
उन्होंने न्यायिक सक्रियता को गलत नजरिए से नहीं देखने की बात कही और इसे कानूनी तथा संवैधानिक जिम्मेदारी का अहम हिस्सा बताया।
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