भारतीय नौसेना अपनी समुद्री ताकत को लगातार मजबूत कर रही है। इसी कड़ी में जल्द ही दो नए अत्याधुनिक एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (ASW) शैलो वॉटर क्राफ्ट ‘अग्रे’ और ‘मालवन’ नौसेना के बेड़े में शामिल होने जा रहे हैं। इन युद्धपोतों का मुख्य उद्देश्य दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनका पीछा करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें नष्ट करना है।
यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब पाकिस्तान चीन की मदद से अपनी नौसेना को आधुनिक बनाने में जुटा है और हांगोर क्लास की नई पनडुब्बियों को शामिल कर रहा है।
भारतीय नौसेना को मिल रही नई ताकत
नौसेना के अनुसार, अब तक आईएनएस अर्णाला, आईएनएस अंद्रोत्त, आईएनएस माहे और आईएनएस अंजदीप जैसे चार ASW शैलो वॉटर क्राफ्ट सेवा में शामिल हो चुके हैं। अब ‘अग्रे’ और ‘मालवन’ भी जल्द आधिकारिक रूप से नौसेना का हिस्सा बनेंगे।
भारत ने वर्ष 2019 में ऐसे 16 युद्धपोतों के निर्माण का अनुबंध किया था। इनमें से आठ का निर्माण कोचिन शिपयार्ड और आठ का निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) द्वारा किया जा रहा है।
क्या है इन युद्धपोतों की खासियत?
ये आधुनिक युद्धपोत अत्याधुनिक एंटी-सबमरीन तकनीकों से लैस हैं। इनमें एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर, लाइटवेट टॉरपीडो, 30 मिमी नौसैनिक तोप, एडवांस कॉम्बैट सिस्टम, हल-माउंटेड सोनार और लो-फ्रीक्वेंसी वैरिएबल डेप्थ सोनार जैसी क्षमताएं मौजूद हैं।
ये पोत लगभग 25 नॉट की गति से चल सकते हैं और एक बार में करीब 3,300 किलोमीटर तक की दूरी तय करने में सक्षम हैं।
पनडुब्बियों के लिए बड़ा खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार ये युद्धपोत तट से 100 से 150 नॉटिकल मील की दूरी तक समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने में सक्षम हैं। 30 से 40 मीटर गहराई वाले समुद्री क्षेत्रों में संचालित होने वाली पनडुब्बियों के खिलाफ इनकी क्षमता बेहद प्रभावी मानी जा रही है।
इनका उपयोग बड़े युद्धपोतों और नौसैनिक बेड़ों के लिए सुरक्षित समुद्री मार्ग तैयार करने में भी किया जाएगा।
पाकिस्तान की हांगोर पनडुब्बियां क्यों चर्चा में?
पाकिस्तान ने चीन के साथ समझौते के तहत आठ हांगोर क्लास पनडुब्बियां खरीदने का फैसला किया है। यह चीन की टाइप-039बी युआन क्लास पनडुब्बी का निर्यात संस्करण है। इनमें से चार पनडुब्बियां चीन में और चार पाकिस्तान के कराची शिपयार्ड में तैयार की जा रही हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक हांगोर क्लास की पहली पनडुब्बी इस समय हिंद महासागर क्षेत्र में मौजूद है और जल्द ही कराची नौसैनिक अड्डे पर पहुंच सकती है।
तकनीकी चुनौतियों पर भी उठते रहे हैं सवाल
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हांगोर क्लास पनडुब्बियों में कुछ तकनीकी सीमाएं भी हैं। कई रिपोर्टों में इनके प्रोपल्शन सिस्टम, सेंसर क्षमता और स्टील्थ तकनीक को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी पनडुब्बी की सबसे बड़ी ताकत उसका गुप्त रूप से संचालन करना होता है, लेकिन कुछ चीनी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां अपेक्षाकृत अधिक शोर पैदा करती हैं, जिससे उनका पता लगाना आसान हो सकता है।
हिंद महासागर में बढ़ेगी भारत की बढ़त
अग्रे और मालवन जैसे नए ASW युद्धपोतों के शामिल होने से भारतीय नौसेना की पनडुब्बी रोधी क्षमता और मजबूत होगी। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति और समुद्री सुरक्षा को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में ये युद्धपोत भारतीय नौसेना की सबसे महत्वपूर्ण ताकतों में शामिल हो सकते हैं और क्षेत्रीय समुद्री संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएंगे।

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