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बांद्रा झुग्गी हटाओ अभियान पर बढ़ा विवाद, मानसून से पहले सैकड़ों परिवारों के बेघर होने पर उठे सवाल

By Dainik Jan Times

Published on: May 22, 2026

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बांद्रा झुग्गी हटाओ अभियान पर बढ़ा विवाद, मानसून से पहले सैकड़ों परिवारों के बेघर होने पर उठे सवाल

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मुंबई में चल रहे बांद्रा झुग्गी हटाओ अभियान को लेकर बहस तेज हो गई है। Western Railway द्वारा गरीब नगर इलाके में किए गए बड़े अतिक्रमण हटाओ अभियान के बाद सैकड़ों परिवार बेघर हो गए हैं। एक तरफ लोग इसे रेलवे सुरक्षा और शहर के विकास के लिए जरूरी बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मानसून से ठीक पहले हुई कार्रवाई पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

बांद्रा रेलवे स्टेशन के पास स्थित गरीब नगर में कई दशकों से झुग्गियां और छोटे व्यापारिक ढांचे बने हुए थे। अदालत से अनुमति मिलने के बाद रेलवे ने यहां सैकड़ों अवैध निर्माणों को हटाने की कार्रवाई शुरू की।

बांद्रा झुग्गी हटाओ अभियान को लेकर क्यों बढ़ा विवाद

रेलवे अधिकारियों का कहना है कि यह क्षेत्र रेलवे ट्रैक और अन्य महत्वपूर्ण ढांचों के बेहद करीब था, जिससे सुरक्षा खतरा बढ़ रहा था। इसके अलावा भविष्य की रेलवे विस्तार योजनाओं के लिए जमीन खाली कराना जरूरी माना गया।

हालांकि स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कार्रवाई का समय गलत चुना गया। उनका तर्क है कि मानसून आने से पहले हजारों लोगों को बिना पर्याप्त पुनर्वास के बेघर कर देना मानवीय दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है।

बेघर परिवारों की तस्वीरों ने लोगों को भावुक किया

कार्रवाई के बाद कई परिवार खुले आसमान के नीचे अपना सामान लेकर बैठे दिखाई दिए। खासतौर पर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं।

स्थानीय निवासी और दैनिक यात्री देवेश कांबले ने कहा कि इलाके में लंबे समय से गंदगी और अपराध की समस्या थी, लेकिन स्कूल यूनिफॉर्म पहने बच्चियों को सड़क किनारे बैठा देखना बेहद दर्दनाक दृश्य था।

रेलवे सुरक्षा और विकास का दिया जा रहा तर्क

रेलवे अधिकारियों का कहना है कि अतिक्रमण के कारण ट्रेनों के संचालन और भविष्य की परियोजनाओं पर असर पड़ रहा था। अधिकारियों के अनुसार कई अवैध ढांचे रेलवे पुलों और इलेक्ट्रिक सिस्टम के बेहद पास बन गए थे, जिससे दुर्घटना का खतरा बना हुआ था।

रेलवे का दावा है कि यह कार्रवाई अदालत के आदेश और कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई है।

पुनर्वास को लेकर उठ रहे सवाल

स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई परिवारों के पास बिजली, पानी और टैक्स से जुड़े दस्तावेज मौजूद थे, फिर भी उन्हें पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था नहीं दी गई।

कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें घर खाली करने के लिए बहुत कम समय मिला। सामाजिक संगठनों का कहना है कि बड़े शहरों में विकास और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

सोशल मीडिया पर बंटी राय

इस पूरे मामले को लेकर सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई नजर आ रही है। कुछ लोग रेलवे की कार्रवाई को सही ठहरा रहे हैं, जबकि कई लोग बेघर हुए परिवारों के प्रति सहानुभूति जता रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।

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