इंदौर। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर का नाम भारतीय इतिहास में सम्मान और जनसेवा के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उन्होंने केवल एक सफल शासिका के रूप में ही नहीं बल्कि प्रजा की सच्ची संरक्षक के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। उनके द्वारा किए गए जनकल्याण के कार्य आज भी देश के कई हिस्सों में दिखाई देते हैं। कुएं बावड़ियां घाट और धर्मशालाएं उनकी दूरदर्शिता और जनहित की सोच की जीवंत मिसाल हैं। यही कारण है कि सदियों बाद भी लोग उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ लोकमाता के नाम से याद करते हैं।
सदियों बाद भी सुरक्षित हैं अहिल्याबाई की यादें
अहिल्याबाई होल्कर के शासनकाल से जुड़ी कई ऐतिहासिक धरोहरें आज भी सुरक्षित रखी गई हैं। इंदौर में मौजूद एक निजी संग्रह में उनके समय के दुर्लभ चांदी और तांबे के सिक्के संरक्षित हैं। इन सिक्कों के साथ एक विशेष कांस्य काइन डाई भी मौजूद है जिसका उपयोग उस समय सिक्कों को ढालने के लिए किया जाता था। इस डाई पर शिवलिंग और बेलपत्र की आकृति बनी हुई है जो लोकमाता की गहरी शिवभक्ति को दर्शाती है। यह धरोहर न केवल इतिहास को जीवंत बनाती है बल्कि उस दौर की सांस्कृतिक पहचान को भी सामने लाती है।
1788 ईस्वी के दुर्लभ सिक्के आज भी हैं मौजूद
संग्रह में एक रुपये और आधे रुपये मूल्य के चांदी के सिक्के भी शामिल हैं जिन पर 1203 हिजरी वर्ष अंकित है। इतिहासकारों के अनुसार यह वर्ष 1788 ईस्वी के बराबर माना जाता है। एक रुपये के सिक्के का वजन लगभग 11.21 ग्राम और आधे रुपये का वजन करीब 5.5 ग्राम बताया जाता है। इन सिक्कों पर की गई नक्काशी और कारीगरी उस समय के शिल्प कौशल का शानदार उदाहरण मानी जाती है। वर्षों बीत जाने के बाद भी इन सिक्कों की चमक और ऐतिहासिक महत्व लोगों को आकर्षित करता है।
एक शब्द जो आज भी बना हुआ है रहस्य
अहिल्याबाई होल्कर के शासनकाल में माल्हारनगर टकसाल से जारी कई दुर्लभ सिक्के भी इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनमें वर्ष 1779 का एक विशेष सिक्का शामिल है जिस पर फारसी भाषा का शब्द “वाला” अंकित है। दिलचस्प बात यह है कि इतिहासकार आज तक यह स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि इस शब्द का उपयोग किस उद्देश्य से किया गया था। यही वजह है कि यह सिक्का इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए आज भी एक रहस्य बना हुआ है।
केंद्रीय संग्रहालय में भी संरक्षित हैं ऐतिहासिक धरोहरें
इंदौर के केंद्रीय संग्रहालय में भी अहिल्याबाई होल्कर के शासनकाल के कई दुर्लभ चांदी के सिक्के सुरक्षित रखे गए हैं। इन सिक्कों पर तत्कालीन मुगल शासक शाह आलम द्वितीय का नाम अंकित है। कुछ सिक्कों पर सूर्य और चंद्रमा के चिन्ह दिखाई देते हैं जबकि एक विशेष सिक्के पर शिवलिंग और बिल्वपत्र का अंकन किया गया है। इतिहासकार इसे देवी अहिल्याबाई की अटूट शिवभक्ति का प्रतीक मानते हैं।
मल्हारी मार्तंड मंदिर में स्थापित हैं 12 ज्योतिर्लिंग
लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर भगवान शिव की परम भक्त थीं। उनकी भक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण इंदौर के राजवाड़ा स्थित मल्हारी मार्तंड मंदिर में देखने को मिलता है। उन्होंने यहां 12 ज्योतिर्लिंगों की स्थापना करवाई थी। मान्यता है कि देशभर के ज्योतिर्लिंग स्थलों से पिंडियां लाकर यहां स्थापित की गई थीं। यह मंदिर प्रदेश का एक अनूठा धार्मिक स्थल माना जाता है जहां सभी 12 ज्योतिर्लिंग एक ही स्थान पर विराजमान हैं।
आज भी होती है विशेष पूजा
मल्हारी मार्तंड मंदिर में वह शिवलिंग भी स्थापित है जिसे अहिल्याबाई होल्कर अपने हाथों में धारण करती थीं। बालू से निर्मित इस शिवलिंग पर स्वर्ण परत चढ़ाई गई है और आज भी इसकी नियमित पूजा की जाती है। यह शिवलिंग न केवल उनकी आस्था का प्रतीक है बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उनकी धार्मिक निष्ठा और आध्यात्मिक जीवन की झलक भी दिखाता है।
लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर केवल एक शासिका नहीं थीं बल्कि जनसेवा धर्म और संस्कृति की सशक्त प्रतीक थीं। उनके द्वारा बनवाए गए जनहित के कार्य आज भी समाज को प्रेरित करते हैं। उनके समय के दुर्लभ सिक्के ऐतिहासिक दस्तावेज और धार्मिक धरोहरें यह साबित करती हैं कि उनका योगदान केवल अपने शासनकाल तक सीमित नहीं था बल्कि सदियों बाद भी उनकी विरासत लोगों के दिलों में जीवित है।

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