मध्य प्रदेश के जंगलों में वन्यजीवों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन उनके इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने का मामला सामने आया है। वन विभाग में वन्यजीव चिकित्सकों का अलग कैडर नहीं होने के कारण राष्ट्रीय उद्यानों और टाइगर रिजर्व में घायल या बीमार वन्यजीवों को समय पर विशेषज्ञ उपचार मिलना चुनौती बना हुआ है। हाल ही में सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में हथिनी स्मिता की मौत के बाद एक बार फिर वन्यजीव चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
हथिनी स्मिता की मौत ने बढ़ाई चिंता
सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के चूरना क्षेत्र में 46 वर्षीय प्रशिक्षित हथिनी स्मिता की मौत 10 अगस्त को हुई थी। जानकारी के अनुसार 9 अगस्त को उसे जंगल में छोड़ा गया था, जहां एक आक्रामक नर हाथी ने उस पर हमला कर दिया। हमले में स्मिता गंभीर रूप से घायल हो गई थी। अगले दिन जब उसे वापस लाया गया, तब उसके शरीर पर गहरे घाव मिले थे। इलाज के बावजूद उसकी जान नहीं बचाई जा सकी।
MP में पहले भी हो चुकी है हाथियों की मौत
वन्यजीवों के इलाज को लेकर यह पहली बार सवाल नहीं उठे हैं। बांधवगढ़ क्षेत्र में कोदो की फसल खाने के बाद कई हाथियों की तबीयत बिगड़ गई थी। समय पर उपचार नहीं मिलने के कारण 10 हाथियों की मौत हो गई थी। उस समय भी बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में वन्यप्राणी चिकित्सक की उपलब्धता को लेकर सवाल उठे थे।
वन विभाग में अलग वन्यजीव चिकित्सक कैडर नहीं
जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश वन विभाग में वन्यजीव चिकित्सकों का अलग कैडर नहीं है। वन्यजीवों के इलाज की जिम्मेदारी पशु चिकित्सकों के भरोसे है। ऐसे में गंभीर रूप से घायल हाथी जैसे बड़े वन्यजीवों के लिए तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
वन विभाग में 11 पशु चिकित्सक और दो शल्य चिकित्सक
वन विभाग में पशु चिकित्सकों के 10 पदों पर संविलियन के माध्यम से डॉक्टर पदस्थ हैं। इसके अलावा एक पशु चिकित्सक और सहायक शल्य पशु चिकित्सकों के दो पदों पर पशु चिकित्सा विभाग से प्रतिनियुक्ति की व्यवस्था बताई गई है। यही चिकित्सक प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यानों और अन्य वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की चिकित्सा और देखभाल का जिम्मा संभालते हैं।
प्रदेश में 11 राष्ट्रीय उद्यान और 9 टाइगर रिजर्व
मध्य प्रदेश में वन्यजीवों का क्षेत्र काफी विस्तृत है। प्रदेश में 11 राष्ट्रीय उद्यान, 9 टाइगर रिजर्व, 26 अभयारण्य और एक ताप्ती कंजर्वेशन रिजर्व है। इतने बड़े वन क्षेत्र में वन्यजीवों की चिकित्सा व्यवस्था के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
सतपुड़ा में स्मिता की मौत के बाद हाथियों की संख्या घटी
स्मिता की मौत के बाद सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में हाथियों की संख्या 9 से घटकर 8 रह गई है। वहीं एक अन्य हथिनी अंजुगम को 75 वर्ष से अधिक उम्र होने के कारण रिटायर किया जा चुका है। दूसरी ओर बांधवगढ़ क्षेत्र में करीब 70 हाथियों के विचरण करने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में विशेषज्ञ चिकित्सा व्यवस्था की जरूरत और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
वन्यजीवों के लिए विशेषज्ञ उपचार की जरूरत
जंगल में रहने वाले हाथी और दूसरे बड़े वन्यजीव घायल होने पर सामान्य पशु चिकित्सा से अलग तरह की देखभाल मांगते हैं। चोट, संक्रमण, आपसी संघर्ष या किसी जहरीली फसल के सेवन जैसी परिस्थितियों में समय पर उपचार बेहद अहम होता है। स्मिता और बांधवगढ़ में हाथियों की मौत के मामलों ने वन्यजीवों के लिए स्थायी और विशेषज्ञ चिकित्सा व्यवस्था की जरूरत को फिर सामने ला दिया है।

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