मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के मुड़िया गांव में दशहरे का नजारा बाकी जगहों से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। यहां रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता, बल्कि 160 साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा के तहत भगवान कृष्ण और कंस के बीच सांकेतिक युद्ध होता है। शनिवार को हुए इस आयोजन में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए और कंस वध के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दोहराया गया।
मुड़िया में रावण नहीं, कंस का होता है वध
मुड़िया गांव की यह परंपरा दशहरे के पर्व को एक अलग पहचान देती है। गांव में कंस की विशाल प्रतिमा तैयार की जाती है और फिर कृष्ण तथा कंस के दल के बीच सांकेतिक युद्ध कराया जाता है। युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान कृष्ण का स्वरूप कंस के मुकुट पर लगी कांस की कलगी को उतारता है। इसी के साथ कंस वध की परंपरा पूरी होती है।
160 साल पुरानी परंपरा के पीछे है महामारी की कहानी
आयोजन से जुड़े लोगों के अनुसार करीब 160 वर्ष पहले मुड़िया गांव में भयंकर महामारी फैल गई थी। उस समय बीमारी के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई थी। संकट के दौर में ग्रामीणों ने महामारी से मुक्ति की कामना करते हुए कंस वध की इस परंपरा की शुरुआत की।
स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार इस परंपरा के शुरू होने के बाद गांव में फिर वैसी महामारी या बड़ी आपदा नहीं आई। यही वजह है कि समय बदलने के बावजूद ग्रामीण इस आयोजन को आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हैं।
घर और खेत की मिट्टी से तैयार होती है कंस की प्रतिमा
इस आयोजन की खास बात यह भी है कि कंस की प्रतिमा तैयार करने में ग्रामीण अपने घरों और खेतों की पवित्र मिट्टी एकत्र करते हैं। इसी मिट्टी से गांव के बाहर कंस की विशाल प्रतिमा बनाई जाती है। प्रतिमा के मुकुट को कांस की कलगी से सजाया जाता है, जो इस पूरी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
दो दलों में बंट जाते हैं गांव के लोग
कंस वध के आयोजन के दौरान गांव के लोग दो अलग-अलग दलों में बंट जाते हैं। एक तरफ भगवान कृष्ण का दल होता है, जबकि दूसरी ओर कंस का दल तैयार किया जाता है। इस दल में बच्चे और बड़े राक्षसों का स्वरूप धारण करते हैं। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच पारंपरिक अंदाज में सांकेतिक युद्ध शुरू होता है।
दो से तीन घंटे तक चलता है रोमांचक युद्ध
कृष्ण और कंस के दलों के बीच होने वाला यह सांकेतिक युद्ध करीब दो से तीन घंटे तक चलता है। इस दौरान पूरा गांव आयोजन में डूबा रहता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक लोगों में खास उत्साह देखने को मिलता है। युद्ध के अंतिम चरण में भगवान कृष्ण का स्वरूप कंस के मुकुट से कांस की कलगी उखाड़ता है और इसी को कंस के सांकेतिक वध के रूप में माना जाता है।
कंस वध के बाद गूंज उठता है पूरा गांव
कंस के वध के साथ ही कृष्ण पक्ष की जीत होती है। इसके बाद गांव में ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न शुरू हो जाता है। लोगों के लिए यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का अवसर भी है। बदलते समय के बीच मुड़िया की यह परंपरा आज भी ग्रामीणों को अपनी जड़ों और लोक संस्कृति से जोड़े हुए है।
दशहरे पर मुड़िया की परंपरा क्यों है खास
जहां देश के ज्यादातर हिस्सों में दशहरे पर रावण दहन के जरिए बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं मुड़िया में यही संदेश कंस वध के माध्यम से दिया जाता है। इस अनूठी परंपरा में धार्मिक आस्था, लोकविश्वास और ग्रामीण संस्कृति तीनों की झलक दिखाई देती है। यही वजह है कि 160 साल से अधिक समय बीतने के बाद भी मुड़िया का कंस वध आयोजन लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

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