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भोजशाला ASI रिपोर्ट 2026 बड़ा खुलासा 12वीं सदी के शिलालेख शिव और वासुकी के संकेत मंदिर शैली के अवशेष सामने

By Dainik Jan Times

Published on: February 24, 2026

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Bhojshala ASI Report Dhar News

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आज हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला कमाल मौला परिसर को लेकर सामने आई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट की जिसने पूरे प्रदेश में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। लंबे समय से विवादों में रहे इस परिसर पर अब एक वैज्ञानिक सर्वे की रिपोर्ट अदालत में पेश की गई है और इसके प्रमुख बिंदु सार्वजनिक हो चुके हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा ढांचे में प्राचीन मंदिर से जुड़े कई स्थापत्य अवयवों का उपयोग दिखाई देता है। दस्तावेज में 12वीं सदी के संस्कृत शिलालेख मिलने की बात दर्ज की गई है। इसके साथ ही शिव से संबंधित चिह्न और वासुकी नाग के संकेतों का भी उल्लेख किया गया है। इन तथ्यों ने इस पूरे मामले को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।

वैज्ञानिक सर्वे में क्या मिला

अदालत के निर्देश पर किए गए इस सर्वे के दौरान परिसर के अलग अलग हिस्सों का बारीकी से दस्तावेजीकरण किया गया। पत्थरों स्तंभों आधार संरचनाओं और उत्कीर्ण लेखों का परीक्षण किया गया। रिपोर्ट के अनुसार कई निर्माण तत्व मंदिर वास्तु शैली से मेल खाते हैं।

रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि वर्तमान संरचना में ऐसे हिस्से शामिल हैं जो पहले से मौजूद किसी बड़े धार्मिक ढांचे से लिए गए प्रतीत होते हैं। स्तंभों बीमों और शिलाखंडों पर बनी आकृतियां इस ओर संकेत करती हैं कि उनका मूल उपयोग मंदिर परिसर में हुआ होगा।

विशेषज्ञों ने संस्कृत भाषा और प्राचीन लिपियों के शिलालेखों का उल्लेख किया है जिन्हें मध्यकालीन कालखंड से जोड़ा गया है। कई पत्थरों पर देवी देवताओं नाग आकृतियों और पारंपरिक धार्मिक प्रतीकों की शिल्पकारी पाई गई है। कुछ चिह्न शिव परंपरा और वासुकी प्रतीक से मेल खाते बताए गए हैं।

पुनः उपयोग की संभावना और ऐतिहासिक परतें

सर्वे टीम ने परिसर में सामग्री के पुनः उपयोग की संभावना भी दर्ज की है। इसका अर्थ यह है कि पुराने ढांचे के हिस्सों को बाद के निर्माण में लगाया गया हो सकता है। पुरातत्व की भाषा में इसे स्पोलिया कहा जाता है।

रिपोर्ट का एक अहम निष्कर्ष यह भी है कि परिसर का इतिहास बहु स्तरीय रहा है। यानी अलग अलग समय में यहां निर्माण और परिवर्तन हुए और पहले के स्थापत्य तत्व किसी न किसी रूप में सुरक्षित या पुनः प्रयुक्त रहे।

हालांकि रिपोर्ट में किसी एक धार्मिक दावे पर अंतिम निर्णय नहीं दिया गया है। इसमें केवल उपलब्ध संरचनात्मक और अभिलेखी साक्ष्यों का तकनीकी विवरण प्रस्तुत किया गया है। यही तकनीकी विवरण अब अदालत में आगे की सुनवाई का आधार बनेगा।

विवाद और अदालती प्रक्रिया

भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच दावे बने हुए हैं। एक पक्ष इसे देवी वाग्देवी का प्राचीन मंदिर मानता है जबकि दूसरा पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को विस्तृत सर्वे कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था।

सर्वे की पूरी प्रक्रिया सुरक्षा और प्रशासनिक निगरानी में संपन्न हुई। दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में निरीक्षण रिकॉर्डिंग और दस्तावेजों का संकलन किया गया। इसके बाद रिपोर्ट अदालत में जमा की गई।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आगे की सुनवाई में रिपोर्ट के हर तकनीकी बिंदु की विस्तार से व्याख्या होगी। अदालत यह परखेगी कि पुरातात्विक साक्ष्य ऐतिहासिक अभिलेख और राजस्व दस्तावेज किस हद तक एक दूसरे का समर्थन करते हैं। ऐसे मामलों में अंतिम फैसला केवल एक रिपोर्ट के आधार पर नहीं बल्कि समग्र साक्ष्यों और कानूनी तर्कों के आधार पर होता है।

फिलहाल 12वीं सदी के शिलालेखों शिव और वासुकी संकेतों तथा मंदिर शैली के अवयवों के उल्लेख ने इस मामले को तथ्यात्मक स्तर पर नई दिशा दी है। अब सभी की नजर अदालत की आगामी प्रक्रिया और अंतिम निर्णय पर टिकी हुई है।

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