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PM मोदी ने मैक्रों से मुलाकात में याद किया वीर सावरकर का मार्सिले कूदना, 1910 की गूंज फिर ताज़ा

By Dainik Jan Times

Published on: February 17, 2026

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PM मोदी ने मैक्रों से मुलाकात में याद किया वीर सावरकर का मार्सिले कूदना, 1910 की गूंज फिर ताज़ा

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मुंबई में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीर सावरकर मार्सिले कूदना की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करते हुए भारत-फ्रांस संबंधों की गहरी जड़ों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि मार्सिले वही शहर है, जहां से प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों ने यूरोप में कदम रखा था, और यही वह स्थान भी है जहां 1910 में वीर सावरकर ने ब्रिटिश हिरासत से बचने के लिए समुद्र में छलांग लगाई थी।

1910 की ऐतिहासिक घटना

वीर सावरकर मार्सिले कूदना की घटना 1910 की है, जब सावरकर को लंदन में नासिक षड्यंत्र मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर ब्रिटिश अधिकारी एएमटी जैक्सन की हत्या में इस्तेमाल रिवॉल्वर भेजने का आरोप था। उन्हें जहाज से भारत लाया जा रहा था, तभी मार्सिले के तट के पास उन्होंने समुद्र में छलांग लगाई और तैरकर फ्रांसीसी तट तक पहुंचे। हालांकि बाद में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें वहीं से गिरफ्तार कर लिया।

फ्रांस का विरोध और हेग ट्रिब्यूनल

इस गिरफ्तारी पर फ्रांसीसी सरकार ने आपत्ति जताई और मामला हेग अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण तक पहुंचा। विवाद इस बात पर था कि फ्रांसीसी भूमि पर गिरफ्तारी कानूनी थी या नहीं। अंततः ट्रिब्यूनल ने माना कि प्रक्रिया में अनियमितता थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार को सावरकर को फ्रांस को लौटाने का दायित्व नहीं था।

सजा और अंडमान का कारावास

भारत लाए जाने के बाद सावरकर पर देशद्रोह का मुकदमा चला और उन्हें दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, जो कुल मिलाकर लगभग 50 वर्ष की कठोर सजा थी। उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल में रखा गया, जहां उन्होंने 12 वर्ष कठिन श्रम में बिताए। 1924 में उन्हें रत्नागिरी लाया गया और 1937 में रिहा किया गया। बाद में वे हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने।

विचारधारा और विरासत

वीर सावरकर मार्सिले कूदना आज भी साहस और संकल्प का प्रतीक माना जाता है। जहां आरएसएस और भाजपा उन्हें राष्ट्रनायक मानते हैं, वहीं कांग्रेस सहित कुछ दल उनके ब्रिटिश सरकार को लिखे दया याचिका पत्रों को लेकर आलोचना करते रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस ऐतिहासिक प्रसंग को याद कर भारत-फ्रांस संबंधों की साझी विरासत को रेखांकित किया। इस घटना की गूंज आज भी कूटनीतिक और वैचारिक विमर्श में सुनाई देती है।

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