अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर 2026 को रूस प्रतिबंध बिल को 262-159 मतों से मंजूरी दे दी। इस विधेयक में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले कुछ प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति को देने का प्रावधान है। भारत भी इस व्यवस्था के संभावित दायरे में आ सकता है। हालांकि, विधेयक पारित होने के साथ भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क तत्काल लागू नहीं हुआ है।
भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ का प्रावधान
विधेयक के तहत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का रास्ता खुलता है। इसके अलावा रूस के तेल से जुड़े प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले कुछ देशों को भी संभावित कार्रवाई के दायरे में रखा गया है।
इस प्रावधान के तहत शुल्क अधिकतम 100 प्रतिशत तक जा सकता है। हालांकि, वास्तविक टैरिफ दर और कार्रवाई का फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में रहेगा। इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि भारतीय उत्पादों पर सीधे 100 प्रतिशत शुल्क लग चुका है।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। ऐसे में अमेरिकी कानून में रूसी ऊर्जा के प्रमुख खरीदारों को निशाना बनाने वाला प्रावधान नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत भी चलती रही है। ऐसे समय में अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ की संभावना दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर असर डाल सकती है। हालांकि, आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिकी प्रशासन कानून बनने के बाद अपने अधिकारों का इस्तेमाल किस तरह करता है।
विधेयक में किन देशों पर नजर
विधेयक में संभावित लक्ष्य के तौर पर रूस के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े आयातकों की व्यवस्था की गई है। इसके लिए कानून लागू होने से पहले के 12 महीनों में आयात की मात्रा को आधार बनाया जाएगा।
इसके अलावा, रूस के तेल प्रतिबंधों से बचने में सहायता करने वाले शीर्ष पांच देशों को भी संभावित कार्रवाई में शामिल किया जा सकता है। हालांकि, कुछ परिस्थितियों में देशों को छूट मिलने का प्रावधान भी रखा गया है।
भारत को तुरंत 100% शुल्क नहीं देना होगा
विधेयक को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सदन की मंजूरी का अर्थ तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होना नहीं है। कानून बनने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति को उपलब्ध अधिकारों के आधार पर अलग से कार्रवाई करनी होगी।
रिपोर्टों के मुताबिक, कानून में कुछ देशों को रूसी ऊर्जा आयात कम करने के लिए परिस्थितियों के अनुसार छूट या अलग व्यवस्था का प्रावधान भी है। इसलिए भारत पर वास्तविक प्रभाव अमेरिकी प्रशासन के अगले फैसलों पर निर्भर करेगा।
सीनेट से पहले ही मिल चुकी है मंजूरी
इस विधेयक को अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त 2026 को 86-11 मतों से मंजूरी दी थी। प्रतिनिधि सभा की मंजूरी के बाद अब इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास भेजा जाएगा।
यह कानून रूस के ऊर्जा क्षेत्र के अलावा रूसी अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और तेल परिवहन से जुड़े तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर भी कार्रवाई का दायरा बढ़ाता है।
राष्ट्रपति के पास रहेगा छूट देने का अधिकार
विधेयक में अमेरिकी राष्ट्रपति को राष्ट्रीय हित के आधार पर प्रतिबंधों से संबंधित कुछ कदमों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। इसका मतलब है कि कानून लागू होने के बाद भी परिस्थितियों के अनुसार अमेरिकी प्रशासन के पास नीतिगत विकल्प मौजूद रहेंगे।
इससे भारत पर संभावित टैरिफ का अंतिम स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं है। आने वाले दिनों में राष्ट्रपति के निर्णय और अमेरिकी प्रशासन की नीति से स्थिति अधिक साफ होगी।
अमेरिकी सांसदों में भी मतभेद
विधेयक को लेकर अमेरिकी संसद में भी सभी सांसद एकमत नहीं रहे। कुछ सांसदों ने राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार दिए जाने पर चिंता जताई है। आलोचकों का तर्क रहा है कि ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल अमेरिकी सहयोगी देशों के खिलाफ भी हो सकता है।
हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के डेमोक्रेटिक रैंकिंग सदस्य ग्रेगरी मीक्स ने राष्ट्रपति को अतिरिक्त टैरिफ शक्तियां देने पर आपत्ति जताई। वहीं विधेयक के समर्थकों का कहना है कि रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए मजबूत प्रतिबंध जरूरी हैं।
अब आगे क्या होगा?
अब विधेयक राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए जाएगा। यदि इसे कानून का रूप मिलता है, तो अमेरिकी प्रशासन के पास रूस से ऊर्जा खरीदने वाले कुछ देशों के खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ लगाने का नया कानूनी आधार होगा।
भारत के मामले में आगे की स्थिति रूसी तेल की खरीद, अमेरिकी प्रशासन के आकलन और दोनों देशों के बीच चल रही व्यापारिक बातचीत से प्रभावित हो सकती है। फिलहाल 100 प्रतिशत टैरिफ को संभावित अधिकार के रूप में देखना उचित है, न कि भारत पर लागू हो चुका शुल्क।

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