प्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिया इटली यात्रा के दौरान रोम के मशहूर Colosseum की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं। इसी बीच भारत के असम में मौजूद 275 साल पुराने ऐतिहासिक रंगघर की भी चर्चा शुरू हो गई, जिसे ‘पूर्व का कोलोसियम’ कहा जाता है।
असम के ऐतिहासिक शहर Sivasagar में स्थित Rang Ghar एशिया के सबसे पुराने जीवित एम्फीथिएटरों में गिना जाता है। यह ऐतिहासिक संरचना कभी अहोम राजाओं के मनोरंजन और खेल प्रतियोगिताओं का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी।
पूर्व का कोलोसियम क्यों कहलाता है रंगघर
रंगघर का निर्माण अहोम शासनकाल में किया गया था और इसका इस्तेमाल शाही खेलों व सांस्कृतिक आयोजनों को देखने के लिए किया जाता था। यह संरचना विशाल मैदान रुपोही पथार की ओर मुख किए हुए बनाई गई थी, जहां भैंसों की लड़ाई, कुश्ती, हाथियों की प्रतियोगिता और बिहू उत्सव जैसे आयोजन होते थे।
रोम के कोलोसियम की तरह रंगघर भी मनोरंजन और सार्वजनिक आयोजनों का केंद्र था। हालांकि दोनों की वास्तुकला पूरी तरह अलग मानी जाती है। कोलोसियम विशाल रोमन शैली का एम्फीथिएटर था, जबकि रंगघर अहोम स्थापत्य कला और असमिया सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता है।
275 साल पुराना है रंगघर का इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार रंगघर का मूल ढांचा 17वीं शताब्दी के अंत में अहोम राजा स्वर्गदेव रुद्र सिंह ने लकड़ी और बांस से बनवाया था। बाद में यह संरचना नष्ट हो गई, जिसके बाद उनके पुत्र स्वर्गदेव प्रमत्त सिंह ने 1744 में इसे ईंट और चूने से दोबारा बनवाया। आज भी वही संरचना मौजूद है।
इस ऐतिहासिक इमारत की खास बात इसका नाव के आकार जैसा छत डिजाइन और अहोम शैली की खूबसूरत नक्काशी है। इसमें मगरमच्छ जैसे पौराणिक जीवों की आकृतियां भी देखने को मिलती हैं।
पारंपरिक तकनीक से हुआ था निर्माण
रंगघर के निर्माण में पतली पकी ईंटों का इस्तेमाल किया गया था, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘हीरा-काम’ कहा जाता है। उस समय सीमेंट की जगह चिपचिपे चावल, मछली, अंडे, दाल और चूने से बने विशेष मिश्रण का उपयोग किया गया था। सदियों बाद भी इस तकनीक के अवशेष आज मौजूद हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संरचना भारत की पारंपरिक इंजीनियरिंग और वास्तुकला का शानदार उदाहरण है।
संरक्षण को लेकर बढ़ी चिंता
लगातार भूकंप, मौसम और समय के असर के कारण रंगघर की दीवारों में कई दरारें आ चुकी हैं। संरक्षण कार्य जारी है और सरकार इसे बड़े हेरिटेज टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की योजना पर काम कर रही है।
हालांकि संरक्षण विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सौंदर्यीकरण नहीं बल्कि वैज्ञानिक तरीके से पुनर्स्थापन की जरूरत है ताकि यह ऐतिहासिक धरोहर लंबे समय तक सुरक्षित रह सके।

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