भोपाल मेट्रो लॉस आज शहर के सबसे चर्चित मुद्दों में से एक बन चुका है। ट्रैफिक जाम से राहत और तेज, आधुनिक सफर का सपना दिखाने वाली भोपाल मेट्रो अब खुद आर्थिक संकट से जूझ रही है। सितंबर 2023 में शुरू हुई इस ‘आधुनिक सवारी’ से रोजाना 50 हजार से ज्यादा यात्रियों की उम्मीद की गई थी, लेकिन हकीकत में महज 5 से 7 हजार लोग ही इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। नतीजा यह है कि मेट्रो हर महीने करोड़ों रुपये के घाटे में चल रही है।
भोपाल मेट्रो की शुरुआत और बढ़ती लागत
भोपाल मेट्रो का पहला चरण भोपाल जंक्शन से एमपी नगर तक लगभग 6.22 किलोमीटर में शुरू हुआ था। कुल 29.8 किलोमीटर के कॉरिडोर की योजना बनाई गई थी, लेकिन अभी तक केवल करीब 14 किलोमीटर ही चालू हो पाए हैं। शुरुआत में 6,941 करोड़ रुपये की लागत अनुमानित थी, जो लगातार देरी के चलते 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच चुकी है। सरकार बदलने के बावजूद परियोजना की रफ्तार धीमी ही बनी रही।
घाटे की सबसे बड़ी वजह क्या है
भोपाल मेट्रो का रोजाना राजस्व औसतन 10 से 15 लाख रुपये के बीच है, जबकि बिजली, स्टाफ और मेंटेनेंस पर 25 से 30 लाख रुपये का खर्च आता है। इस अंतर ने मेट्रो को लगातार घाटे में धकेल दिया है। कम यात्री संख्या इसकी सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है, क्योंकि मेट्रो शहर के प्रमुख रिहायशी और व्यावसायिक इलाकों तक अभी नहीं पहुंच पाई है।
महंगा किराया और कमजोर कनेक्टिविटी
शहरवासियों का कहना है कि मेट्रो का किराया ऑटो और बसों के मुकाबले ज्यादा है। कम दूरी के लिए लोग सस्ते साधन चुनना ज्यादा बेहतर समझते हैं। इसके अलावा कोलार, कटारा हिल्स, बागसेवनिया और हबीबगंज जैसे इलाकों से सीधी कनेक्टिविटी न होना भी भोपाल मेट्रो लॉस की बड़ी वजह बन रहा है।
समय, सुविधा और प्रचार की कमी
मेट्रो की फ्रीक्वेंसी और संचालन समय भी यात्रियों को आकर्षित नहीं कर पा रहा। शाम के बाद सीमित सेवाएं और स्टेशनों पर पार्किंग की कमी लोगों को निजी वाहन छोड़ने से रोकती है। वहीं, मेट्रो को लेकर जागरूकता और प्रमोशनल अभियानों की कमी भी साफ नजर आती है।
सरकार और प्रशासन की भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना में देरी, डिजाइन फ्लॉज और गलत रूट प्लानिंग ने भोपाल मेट्रो को नुकसान पहुंचाया है। अगर समय रहते विस्तार, किराया नीति और कनेक्टिविटी पर ध्यान दिया जाए, तो भोपाल मेट्रो लॉस को कम किया जा सकता है और यह सपना फिर से पटरी पर लौट सकता है।
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