तालिबान शासन में अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव बढ़ा है या नहीं, यह सवाल हालिया पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव के बीच फिर चर्चा में है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने आरोप लगाया है कि तालिबान भारत का “प्रॉक्सी” बन गया है। हालांकि इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया है। ऐसे में तालिबान शासन में अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव कितना बढ़ा है, इसे समझना जरूरी हो जाता है।
भारत ने हाल के हफ्तों में अफगानिस्तान पर पाकिस्तानी हवाई हमलों की कड़ी निंदा की है। इसी के बाद से इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है।
तालिबान शासन में अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव: रिश्तों का विकास
1996 में जब तालिबान पहली बार सत्ता में आया था, तब भारत ने उसे मान्यता नहीं दी थी। उस समय नई दिल्ली तालिबान को पाकिस्तान समर्थित मानती थी। 2001 में अमेरिका समर्थित हस्तक्षेप के बाद भारत ने काबुल में अपनी उपस्थिति मजबूत की और हमीद करजई तथा बाद में अशरफ गनी सरकार के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाई।
2021 में अमेरिका की वापसी के बाद तालिबान फिर सत्ता में लौटा। शुरुआत में भारत ने अपना दूतावास बंद किया, लेकिन बाद में व्यावहारिक नीति अपनाते हुए तकनीकी टीम भेजी और 2024 में काबुल में अपनी उपस्थिति बहाल की। यही वह चरण है, जहां तालिबान शासन में अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव धीरे-धीरे फिर से उभरता दिखा।
कूटनीति और मानवीय सहायता
तालिबान शासन में अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव केवल राजनीतिक संवाद तक सीमित नहीं है। भारत ने मानवीय सहायता, खाद्य सामग्री, दवाइयां और स्वास्थ्य परियोजनाएं भी शुरू की हैं। हालिया भूकंप के बाद भारत ने तुरंत राहत सामग्री भेजी।
दोनों देशों के अधिकारियों के बीच दुबई, काबुल और नई दिल्ली में बैठकें हुईं। अफगान विदेश मंत्री और भारतीय विदेश मंत्री के बीच संवाद ने रिश्तों में स्थिरता का संकेत दिया।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह नीति वैचारिक नहीं बल्कि रणनीतिक है। भारत नहीं चाहता कि पाकिस्तान और चीन को क्षेत्र में पूरी तरह खुली छूट मिल जाए।
पाकिस्तान की चिंता क्यों बढ़ी?
पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान को अपनी रणनीतिक गहराई मानता रहा है। लेकिन तालिबान और इस्लामाबाद के रिश्ते हाल के वर्षों में तनावपूर्ण रहे हैं। पाकिस्तान ने अफगान भूमि से संचालित समूहों पर आरोप लगाए हैं, जबकि तालिबान ने इन्हें खारिज किया है।
इसी पृष्ठभूमि में तालिबान शासन में अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव पाकिस्तान के लिए असहज विषय बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि “दुश्मन का दुश्मन दोस्त” की रणनीति दोनों देशों को करीब ला रही है।
भारत की दीर्घकालिक रणनीति क्या है?
भारत ने 2001 से 2021 के बीच अफगानिस्तान में 3 अरब डॉलर से अधिक निवेश किया था। संसद भवन, सड़कें, बांध और स्वास्थ्य परियोजनाएं इसका हिस्सा रहीं।
अब तालिबान शासन में अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव बनाए रखने का उद्देश्य सुरक्षा हितों की रक्षा, क्षेत्रीय संतुलन और पाकिस्तान-चीन प्रभाव को सीमित करना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत तालिबान की नीतियों से पूरी तरह सहमत नहीं है, लेकिन क्षेत्रीय रणनीति के तहत संवाद जारी रखना आवश्यक समझता है।
निष्कर्ष
तालिबान शासन में अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव बढ़ा है, लेकिन यह पूर्ण राजनीतिक समर्थन नहीं बल्कि व्यावहारिक कूटनीति का परिणाम है। भारत मानवीय सहायता और सीमित राजनयिक संवाद के जरिए अपनी उपस्थिति बनाए रखे हुए है।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह संबंध क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देते हैं या दक्षिण एशिया की राजनीति को और जटिल बनाते हैं।

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