हंकार द रोअर रिव्यू की शुरुआत एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दे से होती है, लेकिन छह एपिसोड के बाद यह सीरीज अपनी कहानी में कुछ खास नया जोड़ती नजर नहीं आती। अनीत पड्डा और फातिमा सना शेख की परफॉर्मेंस कई जगह प्रभाव छोड़ती है, मगर कमजोर गति और परिचित कहानी इसे दमदार अनुभव बनने से रोकती है।
जियोहॉटस्टार की इस हिंदी वेब सीरीज में अनीत पड्डा, फातिमा सना शेख, रघुबीर यादव, अर्जुन माथुर और मोहम्मद जीशान अय्यूब अहम भूमिकाओं में हैं। सीरीज का निर्देशन नित्या मेहरा और करण कपाड़िया ने किया है। कहानी आस्था, प्रभाव, कानून और यौन अपराध के गंभीर मुद्दे को एक साथ सामने लाने की कोशिश करती है।
हंकार द रोअर रिव्यू: क्या है कहानी?
कहानी मध्य प्रदेश के एक काल्पनिक कस्बे से शुरू होती है। 17 वर्षीय मीनू रावत पुलिस स्टेशन पहुंचकर आध्यात्मिक गुरु बापजी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराती है। बापजी का पूरे इलाके में काफी प्रभाव है और बड़ी संख्या में लोग उन पर अटूट विश्वास करते हैं।
मामले की जांच पुलिस अधिकारी जसलीन सिंह सोनी को सौंपी जाती है। इसके बाद मामला केवल एक सामान्य पुलिस जांच तक सीमित नहीं रहता। इसमें धार्मिक प्रभाव, मीडिया की भूमिका, सामाजिक दबाव और न्याय व्यवस्था के बीच टकराव दिखाई देता है।
छह एपिसोड में कहानी मीनू के संघर्ष और उसके बयान के आसपास आगे बढ़ती है। सीरीज यह सवाल उठाने की कोशिश करती है कि प्रभावशाली लोगों के खिलाफ आवाज उठाने वालों को बार-बार खुद को साबित क्यों करना पड़ता है।
कहानी में क्या अच्छा है?
सीरीज का सबसे प्रभावशाली हिस्सा मीनू का बयान है। जब वह अदालत में अपनी बात रखने की कोशिश करती है, तब कहानी भावनात्मक रूप से सबसे ज्यादा असरदार नजर आती है।
अनीत पड्डा इस हिस्से में मीनू की असुरक्षा और संघर्ष को पर्दे पर लाने की कोशिश करती हैं। उनके किरदार को केवल एक कमजोर पीड़िता के रूप में नहीं दिखाया गया है, बल्कि उसके भीतर मौजूद डर और हिम्मत दोनों को सामने रखने का प्रयास किया गया है।
फातिमा सना शेख भी जांच अधिकारी के किरदार में संयमित नजर आती हैं। उनका किरदार किसी पारंपरिक नायक की तरह हर समस्या का तुरंत समाधान नहीं करता। इसके बजाय वह व्यवस्था के भीतर मौजूद मुश्किलों से जूझता दिखाई देता है।
रघुबीर यादव का बापजी वाला किरदार भी कहानी के मजबूत हिस्सों में शामिल है। उनका शांत और सहज अंदाज किरदार को ज्यादा असहज और प्रभावशाली बनाता है।
कलाकारों की परफॉर्मेंस कैसी है?
अनीत पड्डा ने मीनू के किरदार में भावनात्मक गहराई लाने की कोशिश की है। उनके कुछ दृश्य कहानी की गंभीरता को मजबूत करते हैं, हालांकि कई जगह अभिनय और लेखन के बीच अपेक्षित प्रभाव पूरी तरह नहीं बन पाता।
फातिमा सना शेख की परफॉर्मेंस अपेक्षाकृत नियंत्रित है। जसलीन का किरदार व्यवस्था की सीमाओं और व्यक्तिगत जिम्मेदारी के बीच फंसा हुआ दिखाई देता है।
रघुबीर यादव ने बापजी की भूमिका को बिना जरूरत ज्यादा नाटकीय बनाए निभाया है। उनका संयमित अंदाज किरदार को अलग प्रभाव देता है।
राम कपूर का सीमित स्क्रीन टाइम भी याद रह जाता है। वहीं मोहम्मद जीशान अय्यूब के वकील वाले किरदार को कहानी में ज्यादा प्रभावशाली जगह मिल सकती थी। अर्जुन माथुर सहित कुछ अन्य किरदारों को पर्याप्त विस्तार नहीं मिलता।
हंकार द रोअर रिव्यू: क्या कमजोर करता है कहानी?
सीरीज की सबसे बड़ी समस्या इसकी मौलिकता नजर आती है। धार्मिक प्रभाव रखने वाले व्यक्ति पर गंभीर आरोप, उसके समर्थकों का बचाव, जांच पर दबाव और पीड़िता की कानूनी लड़ाई जैसे पहलू हिंदी सिनेमा और वेब सीरीज में पहले भी कई बार देखे जा चुके हैं।
‘आश्रम’, ‘एक बंदा काफी है’ और ‘महाराज’ जैसी कहानियों में भी धार्मिक प्रभाव, अपराध और न्याय व्यवस्था के बीच टकराव को अलग-अलग तरीकों से दिखाया गया है। ऐसे में इस सीरीज से एक अलग दृष्टिकोण की उम्मीद बनती है, लेकिन स्क्रीनप्ले उस स्तर तक नहीं पहुंच पाता।
छह एपिसोड की कहानी कई जगह धीमी महसूस होती है। कुछ दृश्य कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसका रनटाइम बढ़ाते हुए लगते हैं। कई बैकस्टोरी भी मुख्य कहानी में जरूरी गहराई नहीं जोड़ पातीं।
कोर्टरूम और मीडिया एंगल का पूरा इस्तेमाल नहीं
कहानी में कोर्टरूम और मीडिया ट्रायल दो महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते थे। इन दोनों के जरिए समाज की राय और कानूनी प्रक्रिया के बीच का तनाव ज्यादा मजबूती से दिखाया जा सकता था।
हालांकि, सीरीज इन पहलुओं को छूती जरूर है, लेकिन उनका पर्याप्त विस्तार नहीं करती। यही वजह है कि गंभीर विषय होने के बावजूद कहानी कई जगह अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं कर पाती।
अंतिम फैसला
हंकार द रोअर एक गंभीर विषय उठाती है और कुछ हिस्सों में प्रभावशाली भी साबित होती है। अनीत पड्डा, फातिमा सना शेख और रघुबीर यादव की परफॉर्मेंस कहानी को संभालने की कोशिश करती हैं।
लेकिन परिचित कहानी, धीमी रफ्तार और सीमित स्क्रीनप्ले इसे ज्यादा प्रभावशाली वेब सीरीज बनने से रोकते हैं। अगर इस कहानी में कुछ नया दृष्टिकोण और कोर्टरूम-मीडिया टकराव को ज्यादा गहराई मिलती, तो इसका असर कहीं मजबूत हो सकता था।

Leave a Comment