उज्जैन की जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी शिप्रा नदी को सिंहस्थ-2028 से पहले साफ और स्नान योग्य बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है। उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड (यूएससीएल) ने नदी के पानी की गुणवत्ता सुधारने के लिए आधुनिक तकनीक तलाशने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया गया है। खास बात यह है कि किसी एक तकनीक को पहले से तय नहीं किया गया है, बल्कि देश-दुनिया में इस्तेमाल हो चुकी अलग-अलग तकनीकों के विकल्प आमंत्रित किए गए हैं।
पहले 3 से 5 किलोमीटर में होगा तकनीक का परीक्षण
यूएससीएल की योजना के मुताबिक सबसे पहले शिप्रा नदी के करीब 3 से 5 किलोमीटर हिस्से में चुनी गई तकनीक का पायलट परीक्षण किया जाएगा। अगर इसके परिणाम संतोषजनक रहे तो नगर निगम सीमा में आने वाले करीब 12 से 15 किलोमीटर के शिप्रा क्षेत्र में इसे विस्तार दिया जा सकता है। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य नदी के पानी की गुणवत्ता में वास्तविक और मापने योग्य सुधार लाना है।
शिप्रा में घुलित ऑक्सीजन बढ़ाने पर रहेगा जोर
नई तकनीक से शिप्रा के पानी में घुलित ऑक्सीजन बढ़ाने के साथ बीओडी, सीओडी, अमोनिया, दुर्गंध और दूसरे प्रदूषक तत्वों को कम करने की उम्मीद है। यूएससीएल ऐसी व्यवस्था चाहता है, जिसके परिणाम केवल कागजों तक सीमित न रहें बल्कि पानी की गुणवत्ता में साफ तौर पर दिखाई दें। इसके लिए रियल टाइम मॉनिटरिंग की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।
पहले पता चलेगा नदी में प्रदूषण का असली कारण
किसी तकनीक को लागू करने से पहले शिप्रा की मौजूदा स्थिति का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा। इसके तहत बेसलाइन सर्वे, नदी का सर्वेक्षण, जल प्रवाह, प्रदूषण भार और पानी की गुणवत्ता की जांच की जाएगी। इसके साथ गणितीय मॉडलिंग और हाइड्रोडायनामिक सिमुलेशन के जरिए नदी में प्रदूषण के हॉटस्पॉट भी चिह्नित किए जाएंगे। यानी पहले प्रदूषण की समस्या और उसके स्रोत को समझा जाएगा, फिर उसके मुताबिक तकनीक का चयन होगा।
नैनोबबल से लेकर जैविक उपचार तक कई विकल्प
यूएससीएल ने तकनीक के लिए किसी एक विकल्प तक खुद को सीमित नहीं किया है। संभावित समाधानों में एडवांस्ड ऑक्सीनेशन, नैनोबबल, इन-सिटू बायोरिमेडिएशन, फ्लोटिंग ट्रीटमेंट सिस्टम, एडवांस्ड ऑक्सीडेशन और इलेक्ट्रोकेमिकल ट्रीटमेंट जैसी तकनीकें शामिल हो सकती हैं। जैविक और प्राकृतिक आधारित समाधान भी प्रस्तावित किए जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर एक से ज्यादा तकनीकों को मिलाकर संयुक्त समाधान देने की भी गुंजाइश रखी गई है।
सिंहस्थ के दौरान सबसे बड़ी परीक्षा होगी
शिप्रा की सफाई के लिए चुनी जाने वाली तकनीक को सामान्य परिस्थितियों के साथ-साथ सिंहस्थ के दौरान बढ़ने वाले दबाव में भी प्रभावी साबित होना होगा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने, पीक स्नान दिवस, कम जल प्रवाह और अधिक जैविक प्रदूषण जैसी परिस्थितियों में भी तकनीक की क्षमता परखी जाएगी। मौसम के अलग-अलग दौर यानी गर्मी, सर्दी और मानसून में भी इसके प्रदर्शन को देखा जाएगा।
कम ऊर्जा और आसान रखरखाव को मिलेगी प्राथमिकता
यूएससीएल ऐसी तकनीक चाहता है जिसे कम ऊर्जा में संचालित किया जा सके और जिसका रखरखाव भी ज्यादा मुश्किल न हो। इसके अलावा तेजी से तैनाती, डिजिटल मॉनिटरिंग और भविष्य में बड़े क्षेत्र में विस्तार की क्षमता को भी महत्वपूर्ण माना गया है। पायलट के दौरान तकनीक के वास्तविक प्रदर्शन का आकलन किया जाएगा।
पायलट के बाद थर्ड पार्टी करेगी परिणामों की जांच
पहले चरण में 3 से 5 किलोमीटर के हिस्से में पायलट प्रोजेक्ट चलाया जाएगा। इसके परिणामों का स्वतंत्र थर्ड पार्टी से सत्यापन कराया जाएगा। अगर तकनीक तय मानकों पर खरी उतरती है और पानी की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार दिखाई देता है, तभी इसे बड़े क्षेत्र में लागू करने की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। डिजाइन, पायलट, कमीशनिंग, मॉनिटरिंग, संचालन और रखरखाव के साथ ज्ञान हस्तांतरण भी पूरी प्रक्रिया का हिस्सा रहेगा।
फिलहाल कोई निश्चित बजट तय नहीं
अभी यूएससीएल की यह प्रक्रिया केवल आधुनिक तकनीक की तलाश और संभावित समाधान देने वाली संस्थाओं को शॉर्टलिस्ट करने के लिए है। किसी एक कंपनी को काम सौंपने या निश्चित बजट तय करने की घोषणा इस चरण में नहीं हुई है। पायलट के प्रदर्शन के बाद आगे की खरीद प्रक्रिया तय की जा सकती है। कंपनियां कैपेक्स, डीबीओ, बीओओटी, किराये, ट्रीटमेंट-एज-ए-सर्विस, पीपीपी या परिणाम आधारित मॉडल जैसे विकल्प भी सुझा सकती हैं।
31 अगस्त तक जमा किए जा सकेंगे प्रस्ताव
ईओआई के तहत आवेदन करने वाली संस्था के पास पिछले पांच वर्षों में इसी प्रकृति का कम से कम एक सफल प्रोजेक्ट होना जरूरी बताया गया है। तकनीक को एनजीटी और सीपीएचईईओ के मानकों के अनुरूप साबित करना होगा। आवेदक का पिछले तीन वर्षों का औसत वार्षिक टर्नओवर कम से कम पांच करोड़ रुपये होना भी जरूरी है। प्री-ईओआई बैठक और साइट विजिट 19 अगस्त को होगी, जबकि प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तारीख 31 अगस्त निर्धारित की गई है।
कान्ह का प्रदूषित पानी शिप्रा में रोकने की भी तैयारी
शिप्रा को साफ करने की योजना केवल नई तकनीक तक सीमित नहीं है। नदी में पहुंच रहे प्रदूषण के स्रोतों को रोकने के लिए भी कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है। करीब 1133 करोड़ रुपये की कान्ह डायवर्शन क्लोज डक्ट परियोजना के जरिए कान्ह नदी का प्रदूषित पानी शिप्रा में मिलने से रोकने की योजना है। नमामि गंगे मिशन के तहत पीलियाखाल नाले पर करीब 81 करोड़ रुपये की लागत से सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट और भैरवगढ़ नाले पर ईटीपी प्लांट लगाए जा रहे हैं।
सीवरेज और जल प्रवाह सुधारने पर भी जोर
अमृत मिशन के तहत करीब 912 करोड़ रुपये से भूमिगत सीवरेज पाइपलाइन बिछाने का काम भी प्रस्तावित है। वहीं शिप्रा में पर्याप्त जल प्रवाह बनाए रखने के लिए करीब 445 करोड़ रुपये की सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी बांध परियोजना पर भी काम किया जा रहा है। इन योजनाओं के साथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल शिप्रा की सफाई और जल गुणवत्ता सुधार की व्यापक रणनीति का हिस्सा बनने जा रहा है।
सिंहस्थ-2028 से पहले शिप्रा को साफ करने की चुनौती
उज्जैन में सिंहस्थ-2028 से पहले शिप्रा को साफ और स्नान योग्य बनाना प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती है। प्रदूषण के स्रोतों पर रोक, सीवरेज व्यवस्था में सुधार, पर्याप्त जल प्रवाह और नई तकनीक के इस्तेमाल को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। अब 3 से 5 किलोमीटर के पायलट परीक्षण के नतीजे यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि शिप्रा की जल गुणवत्ता सुधारने के लिए कौन सा समाधान बड़े स्तर पर कारगर साबित हो सकता है।

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