उज्जैन में शिप्रा नदी की आरती को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। महाकाल मंदिर समिति की ओर से वैदिक प्रशिक्षण ले रहे 21 बटुकों से आरती कराए जाने के बाद तीर्थ पुरोहितों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि शिप्रा तट पर आरती कराने की परंपरा सदियों पुरानी है और इसे तीर्थ पुरोहित ही निभाते आए हैं। लगातार दूसरे दिन विरोध के बीच पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में बटुकों ने आरती की, जिसके बाद मामला और चर्चा में आ गया है।
बटुकों से आरती कराने पर क्यों नाराज हैं तीर्थ पुरोहित
तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि शिप्रा तट पर तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और पूजन के साथ नदी की आरती भी उनकी पुरानी धार्मिक परंपरा का हिस्सा रही है। उनका आरोप है कि नई व्यवस्था के जरिए इस परंपरा में बदलाव किया जा रहा है। पुरोहितों का कहना है कि अगर आरती को और भव्य बनाने की जरूरत है तो इसके लिए उनसे सुझाव लिए जा सकते हैं, लेकिन आरती की जिम्मेदारी उनकी परंपरा के अनुसार उन्हीं के पास रहनी चाहिए।
मंदिर समिति ने बताई अपनी अलग वजह
महाकाल मंदिर समिति का कहना है कि बटुकों से कराई जा रही शिप्रा आरती का आयोजन निशुल्क है। समिति के अनुसार इसका उद्देश्य किसी पारंपरिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि वैदिक शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों को धार्मिक गतिविधियों से जोड़ना और शिप्रा आरती को अधिक व्यवस्थित तथा शास्त्रसम्मत स्वरूप देना है।
लगातार दूसरे दिन हुआ विरोध
विवाद के बीच शनिवार को तीर्थ पुरोहितों ने लगातार दूसरे दिन विरोध दर्ज कराया। उन्होंने शिप्रा नदी में उतरकर जल सत्याग्रह किया। दूसरी ओर प्रशासन की मौजूदगी में बटुकों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ आरती की। इससे रामघाट और आसपास का क्षेत्र इस विवाद के कारण चर्चा में रहा।
21 बटुकों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ की आरती
महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति ने गुरुवार शाम रामघाट के समीप शिप्रा आरती की शुरुआत की थी। इस दौरान श्री महाकालेश्वर वैदिक प्रशिक्षण व शोध संस्थान से जुड़े 21 विद्यार्थियों ने वैदिक मंत्रों के बीच आरती की। प्रशासन इस पहल को धार्मिक परंपरा में वैदिक शिक्षा के समावेश और विद्यार्थियों को व्यवहारिक अनुभव देने की दिशा में कदम मान रहा है।
उज्जैन में देशभर से आते हैं वेद पढ़ने वाले विद्यार्थी
उज्जैन लंबे समय से वेद और संस्कृत की शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां श्री महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान, श्री महाकालेश्वर वैदिक प्रशिक्षण व शोध संस्थान और श्री महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। यहां वेद, ज्योतिष, कर्मकांड और मंदिर प्रबंधन जैसे विषयों की शिक्षा भी दी जाती है।
परंपरा और नई व्यवस्था के बीच बढ़ी चुनौती
मंदिर समिति का मानना है कि वेद और धार्मिक विधियों का अध्ययन कर चुके बटुक मंदिरों और तीर्थ स्थलों की धार्मिक व्यवस्थाओं को अधिक शास्त्रसम्मत बनाने में योगदान दे सकते हैं। वहीं तीर्थ पुरोहित अपनी पारंपरिक भूमिका को लेकर चिंतित हैं। ऐसे में शिप्रा आरती का मुद्दा अब केवल एक आयोजन तक सीमित न रहकर परंपरा और नई व्यवस्था के बीच संतुलन का सवाल बनता दिखाई दे रहा है।
प्रशासन के सामने समाधान निकालने की चुनौती
विवाद बढ़ने के बाद पुलिस और प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। एक तरफ मंदिर समिति अपनी व्यवस्था को जारी रखने की बात कह रही है, वहीं दूसरी ओर तीर्थ पुरोहित अपनी सदियों पुरानी परंपरा को बनाए रखने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने दोनों पक्षों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसा रास्ता निकालने की चुनौती है, जिससे शिप्रा आरती की धार्मिक गरिमा भी बनी रहे और विवाद भी आगे न बढ़े।

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