आज हम आपको एक ऐसे फैसले के बारे में बता रहे हैं जिसने मध्य प्रदेश में भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर बड़ा संदेश दिया है। मप्र हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने शिवपुरी में साल 2014 में हुई डाटा एंट्री ऑपरेटर भर्ती को पूरी तरह रद्द कर दिया है। यह फैसला उन सभी लोगों के लिए बेहद अहम है जो सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता और न्याय की उम्मीद रखते हैं।
कोर्ट ने क्यों रद्द की पूरी भर्ती प्रक्रिया
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए साफ कहा कि भर्ती प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई थी। न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहारावत की एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। अदालत ने पाया कि वर्ष 2014 में जारी विज्ञापन तय नियमों के खिलाफ था और इसी आधार पर की गई सभी नियुक्तियां भी अवैध मानी गईं।
नियमों की अनदेखी कैसे बनी बड़ी वजह
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता जय प्रकाश कुशवाह ने कोर्ट में बताया कि भर्ती प्रक्रिया में 14 जुलाई 2011 के सर्कुलर का पालन नहीं किया गया। इस सर्कुलर के अनुसार केवल स्नातक योग्यता और मेरिट के आधार पर चयन होना चाहिए था लेकिन शिवपुरी प्रशासन ने नियमों के खिलाफ 60 प्रतिशत अंक की अनिवार्यता जोड़ दी। इससे कई योग्य उम्मीदवार आवेदन करने से ही वंचित रह गए और पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई।
कोर्ट ने प्रशासन की गलती को माना गंभीर
राज्य की ओर से इस विज्ञापन का बचाव किया गया लेकिन कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद साफ पाया कि अतिरिक्त कलेक्टर द्वारा तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अदालत ने इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना और स्पष्ट कहा कि ऐसी गलती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
तीन महीने में नई भर्ती का निर्देश
हाई कोर्ट ने शिवपुरी कलेक्टर को आदेश दिया है कि तीन महीने के भीतर नियमों के अनुसार नया विज्ञापन जारी किया जाए। साथ ही जिन अधिकारियों की गलती से यह स्थिति बनी उनके खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए हैं। यह फैसला आने वाले समय में भर्ती प्रक्रियाओं को और पारदर्शी बनाने में मदद कर सकता है।
याचिकाकर्ता को मिली राहत और मुआवजा
कोर्ट ने यह भी माना कि प्रशासनिक गलती की वजह से याचिकाकर्ता भर्ती में शामिल नहीं हो पाए थे। इसलिए नई भर्ती में उनके आवेदन को आयु सीमा के आधार पर खारिज नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को 1 लाख 50 हजार रुपये का मुआवजा देने और 25 हजार रुपये स्वच्छता फंड में जमा कराने का आदेश दिया। कुल 1 लाख 75 हजार रुपये की यह राशि बाद में दोषी अधिकारियों से वसूली जा सकती है।
यह फैसला क्यों है खास
यह फैसला सिर्फ एक भर्ती रद्द करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक बड़ा संदेश है कि सरकारी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और नियमों का पालन जरूरी है। इससे यह भी साफ होता है कि अगर कहीं भी अनियमितता होगी तो अदालत सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी।

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