भारत में इन दिनों बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच एलपीजी संकट भारत चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। अंतरराष्ट्रीय तनाव और समुद्री मार्गों में बाधा के कारण देश की रसोई गैस आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे समय में भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित एक स्वदेशी तकनीक उम्मीद की नई किरण दिखा रही है, जो आयात पर निर्भरता कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
भारत हर साल करीब 31.3 मिलियन मीट्रिक टन एलपीजी की खपत करता है। इसमें से लगभग 60 से 67 प्रतिशत गैस विदेशों से आयात की जाती है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस आयात का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरता है। यही कारण है कि जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तब एलपीजी संकट भारत की आशंका भी बढ़ जाती है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट और एलपीजी संकट भारत
हाल ही में ईरान-अमेरिका-इजराइल तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई। इसका असर भारत की गैस आपूर्ति पर तुरंत दिखाई दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार साप्ताहिक एलपीजी आयात लगभग 30 प्रतिशत तक कम हो गया। कई शहरों में व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की आपूर्ति भी रुक गई।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू करते हुए घरेलू गैस सप्लाई को प्राथमिकता दी। साथ ही रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने का निर्देश दिया गया। इसके अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अल्जीरिया से वैकल्पिक आपूर्ति के प्रयास तेज किए गए।
हालांकि यह कदम अस्थायी राहत दे सकते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे एलपीजी संकट भारत की मूल समस्या हल नहीं होती।
गैस मिश्रण की चुनौती क्यों बढ़ाती है एलपीजी संकट भारत
भारत में घरेलू रसोई गैस के लिए लगभग 60:40 के अनुपात में ब्यूटेन और प्रोपेन का मिश्रण आवश्यक होता है। मध्य-पूर्व से मिलने वाली एलपीजी इस मिश्रण के काफी करीब होती है, क्योंकि यह तेल रिफाइनिंग का उप-उत्पाद होती है।
वहीं अमेरिका से मिलने वाली एलपीजी मुख्य रूप से प्रोपेन आधारित होती है, जो प्राकृतिक गैस प्रोसेसिंग से बनती है। इस कारण गैस मिश्रण में अंतर आता है और इसे भारतीय उपयोग के लिए अनुकूल बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यही वजह है कि आपूर्ति का स्रोत बदलना हमेशा आसान समाधान नहीं होता और एलपीजी संकट भारत की चिंता बनी रहती है।
स्वदेशी तकनीक से एलपीजी संकट भारत का संभावित समाधान
भारत के वैज्ञानिक लंबे समय से एलपीजी के विकल्प पर काम कर रहे हैं। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद की नेशनल केमिकल लेबोरेटरी (CSIR-NCL) ने डाइमेथाइल ईथर (DME) आधारित तकनीक विकसित की है। यह तकनीक 2020 से ही डेमो स्तर पर तैयार बताई जा रही है।
डाइमेथाइल ईथर एक स्वच्छ ईंधन है जिसे मेथनॉल से बनाया जा सकता है और इसे एलपीजी के साथ मिलाकर उपयोग किया जा सकता है। यदि इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाए, तो यह आयातित गैस पर निर्भरता कम कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में एलपीजी संकट भारत को काफी हद तक कम कर सकती है।
मेथनॉल अर्थव्यवस्था से मजबूत हो सकती है ऊर्जा सुरक्षा
डाइमेथाइल ईथर तकनीक को लागू करने के लिए देश में मेथनॉल आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना जरूरी होगा। इसके साथ ही एलपीजी में डीएमई मिश्रण को अनिवार्य बनाने की नीति और मजबूत संस्थागत समर्थन भी आवश्यक होगा।
यदि यह रणनीति सफल होती है, तो भारत न केवल गैस आयात पर निर्भरता घटा सकता है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत कर सकता है। ऐसे में मौजूदा एलपीजी संकट भारत देश के लिए एक अवसर भी बन सकता है, जिससे घरेलू तकनीक और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।

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